बस्तर जिले में अब तक 35 हजार से ज्यादा हितग्राहियों को पौने 23 हजार हेक्टेयर रकबा से अधिक का वन अधिकार पत्र वितरित

जगदलपुर.छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को एक बड़ी सौगात मिली है, जब हजारों परिवारों को उन्हें उनके पारंपरिक काबिज वन भूमि का अधिकार प्रदान किए गए हैं। यह कदम न केवल आदिवासी समुदायों की आजीविका को मजबूत कर रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी अधिनियम के तहत बस्तर जिले में व्यक्तिगत वन अधिकार पट्टों के तहत 35,180 आवेदनों में 22,775 हेक्टेयर क्षेत्र की मंजूरी दी गई है। यह पट्टे उन आदिवासियों को दिए गए हैं जो पीढ़ियों से जंगलों में रहते आए हैं और अब अपनी काबिज वन भूमि का कानूनी हक पा रहे हैं। इससे वन अधिकार प्राप्त हितग्राहियों को खेती-किसानी को बढ़ावा देकर आजीविका संवर्धन में सहूलियत हो रही है।

सामुदायिक वन अधिकार पत्र के 6209 प्रकरणों में मिली साढ़े 24 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल के उपयोग की मिली मंजूरी

     अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी अधिनियम के तहत जिले में सामुदायिक वन अधिकार पट्टों के अंतर्गत 6,209 आवेदनों को मंजूरी मिली है जिसमें 24,506 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इन क्षेत्रों का स्कूल, अस्पताल, आंगनबाड़ी केन्द्र, चारागाह इत्यादि सार्वजनिक प्रयोजन के लिए उपयोग किया जा रहा है। वहीं सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के तहत 348 आवेदनों पर 1,25,962 हेक्टेयर क्षेत्र का वितरण किया गया है। ये वनाधिकार स्थानीय समुदायों को वनोपज संग्रहण एवं जड़ी-बूटी का समुचित दोहन सहित वनों के प्रबंधन, संरक्षण और उपयोग की जिम्मेदारी मिली है, जिससे जैव विविधता की रक्षा होती है और वनों की सुरक्षा एवं प्रबंधन में स्थानीय समुदाय की सहभागिता को सुनिश्चित हो रही है। साथ ही उक्त वन संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के फलस्वरूप इन वन निवासियों

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