दीपिका शोरी ने कड़े शब्दों में कहा की “क्या बस्तर की चेतना इतनी कमजोर हो गई है कि हिंसा के प्रतीकों को मंच पर नचाया जाएगा? क्या हम अपने ही शहीदों का अपमान करने पर उतर आए हैं?”उन्होंने कहा कि भूमकाल दिवस बस्तर की अस्मिता, स्वाभिमान और ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीक है। ऐसे पावन अवसर पर एक कुख्यात नक्सली के गीत बजाना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि युवाओं के मानस को जहर देने का प्रयास है।
“एक ओर सार्वजनिक मंच पर गीत बजाकर युवाओं से नृत्य कराया जा रहा है, दूसरी ओर उसी व्यक्ति और उसकी पत्नी के चिता स्थल पर 80–100 बाहरी लोगों की भीड़ पूजा-अर्चना और क्रियाकर्म कर रही है। यह संयोग नहीं हो सकता। यह शांत बस्तर को फिर से भटकाने की सोची-समझी साजिश भी हो सकती है,” उन्होंने कहा।
दीपिका शोरी ने स्पष्ट किया कि हमारे युवाओं के आदर्श भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, राजगुरु, सुभाष चन्द्र बोस और भीमराव अंबेडकर जैसे राष्ट्रनायक हैं—न कि वे लोग जिनका नाम निर्दोषों के खून और दहशत से जुड़ा रहा है।
उन्होंने आयोजकों पर सीधा सवाल दागते हुए कहा हैँ की किसके इशारे पर ऐसे गीत चलाए गए? किस मानसिकता के तहत युवाओं को इस दिशा में धकेला जा रहा है? यह सामान्य चूक नहीं, वैचारिक अपराध है।”
पूर्वती की घटना पर उन्होंने कहा कि संवेदनशील नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बाहरी लोगों का इतने बड़े स्तर पर एकत्र होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चेतावनी है। “यदि यह केवल धार्मिक क्रियाकर्म था, तो इसकी पूर्व सूचना क्यों नहीं? और यदि इसके पीछे कोई वैचारिक नेटवर्क सक्रिय है, तो उसे बेनकाब करना आवश्यक है।”
उन्होंने छत्तीसगढ़ गृह विभाग से उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह गलत परंपरा बन जाएगी।“मैं इसका पुरजोर विरोध करती हूं और हर मंच पर करूंगी। बस्तर की शांति से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।”

